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आखिर क्यों धोबी का कुत्ता ना घर का और ना ही घाट का हो पाया !

आखिर क्यों धोबी का कुत्ता ना घर का और ना ही घाट का हो पाया !
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आखिर क्यों धोबी का कुत्ता ना घर का और ना ही घाट का हो पाया !

आज हम आपको बताने जा रहे है कि आखिर क्यों धोबी का कुत्ता ना घर का और ना ही घाट का हो पाया?

यह जानने से पहले आप ये बताइये कि क्या आपको नीचे लिखें प्रश्न के उत्तर के बारे में जानकारी है?

प्रश्न – कुतका किसे कहा जाता है?

यदि हाँ! तो फिर तो आपको पता ही होगा कि आखिर क्यों धोबी का कुत्ता ना घर का और ना ही घाट का हो पाया !

और यदि आप ऊपर लिखें प्रश्न के आंसर के बारे में नहीं जानते तो चलिए हम आपको बताते है कि कुतका किसे कहा जाता है?

तो दोस्तों, कुतका लकड़ी के खूंटे को कहा जाता है, जो घर के बाहर लगी रहती थी! उस पर गंदे कपडे लटकाये जाते थे! धोबी उस कुतके से गंदे कपडे उठाकर घाट पर ले जाता था और  कपडे धोने के बाद धुले हुए कपडे उसी कुतके पर टांग कर चला जाता था!

इसीलिए ये कहावत बनी कि धोबी का कुतका घर का ना घाट का!

आइये अब ये जानते है कि आखिर क्यों धोबी का कुत्ता ना घर का और ना ही घाट का हो पाया?

असली कहावत धोबी का कुतका घर का ना घाट का! थी

पता नहीं क्यों 🤔 लोगो ने कुतके को कुत्ते में बदल दिया और कहने लगे .

धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का!

जबकि बेचारे कुत्ते का इसमें कोई रोल ही नहीं है, वो तो धोबी के साथ घर में भी रहता है और घाट पर भी जाता है!

तो आपको ये समझ आ ही गया होगा कि संप्रेक्षण यानि कम्युनिकेशन में जितने चैनल्स ऐड होते जाते है,, बात का मतलब भी बदलने लगता है! इसीलिए अपनी बात को सही तरह से व्यक्त करें ताकि रिश्तो में मिठास बनी रहे!

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